अनमोल वचन
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!! पर्वाधिराज पर्युषण पर्व !!

इंतज़ार की घड़ियाँ होने वाली है खत्म...द्वार पर दस्तक देने जा रहा है पर्वो का राजा महाराजा पर्वाधिराज पर्युषण पर्व जिसे हम दश लक्षण धर्म के नाम से भी जानते है ...जिसका स्वागत अभिनन्दन करेंगे आज शाम को आदीश्वर धाम चाकसू में...देखे एक अनूठा प्रयास...तपोभूमि प्रणेता के सानिध्य में किस तरह होगा स्वागत पर्युषण पर्व [...]

इंतज़ार की घड़ियाँ होने वाली है खत्म…द्वार पर दस्तक देने जा रहा है पर्वो का राजा महाराजा पर्वाधिराज पर्युषण पर्व जिसे हम दश लक्षण धर्म के नाम से भी जानते है …जिसका स्वागत अभिनन्दन करेंगे आज शाम को आदीश्वर धाम चाकसू में…देखे एक अनूठा प्रयास…तपोभूमि प्रणेता के सानिध्य में किस तरह होगा स्वागत पर्युषण पर्व का …हर आने वाले अतिथि का स्वागत करना हमारी भारतीय परम्परा रही है …जब महापर्व द्वार पर आने वाला हो तो स्वागत ना हो ऐसा नही हो सकता…
आज शाम 7 बजे आना ना भूले …आदीश्वर धाम चाकसू…

तपोभूमि प्रणेता…के सानिध्य में मनाया जाएगा पर्वाधिराज पर्युषण पर्व …आदीश्वर धाम चाकसू…में आपको आमंत्रित कर रहे है हम…आत्मशुद्धि के इस महोत्सव में शामिल होकर सातिशय पुण्य का अर्जन करे…और 27 सितम्बर को शाम 5:30 बजे करेंगे पूज्य गुरुदेव श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज के मुखारविंद के साथ सामूहिक श्रावक प्रतिक्रमण का महा आयोजन..अनोखी क्षमा वाणी के साथ 28 सितम्बर को देंगे पर्वाधिराज को विदाई…

!! उत्तम क्षमा धर्म !!

पर्युषण पर्व का शुभारम्भ हुआ उत्तम क्षमा धर्म की पूजा आराधना के साथ…तपोभूमि प्रणेता के सानिध्य में प्रारंभ हुआ दसलक्षण महामंडल विधान..दमक उठा आदीश्वर धाम पर्युषण पर्व की स्वर्णिम आभा से…
: क्षमा धर्म पर तपोभूमि प्रणेता बोले…क्रोध ने हमेशा परिवारों को तोडा है और क्षमा ने सबको जोड़ा है क्रोध करना है तो दुसरो पर करो अपनों पर नहीं और जब अपनों पर क्रोध नही आयेगा तो एक दिन क्रोध आपकी ज़िन्दगी से ही चला जायेगा …फिर अपनों पर क्या दुसरो पर भी कभी क्रोध नही आएगा और क्षमा ही आपके जीवन में परिवर्तन लाता है…

!! उत्तम मार्दव धर्म !!

उत्तम मार्दव धर्म…पर बोले..तपोभूमि प्रणेता…

मार्दव धर्म सिखाता है विनयवान हो जाना…विनम्र हो जाना…नमन को भाषित करता है मार्दव धर्म…हाथ जोड़ कर नमन करना झुक जाना …नमस्कार कर विनय शील हो जाना ही मार्दव धर्म को धारण करना है..हाथ जोड़ जोड़ कर एक सामान्य व्यक्ति नेता मंत्री बन जाता है…सिर्फ झुकने मात्र से संसार तुम्हे पलकों पर बिठा लेता है …अहंकार को छोड़ कर विनम्रता धारण करना ही मार्दव है…
-मुनि प्रज्ञा सागर
आदीश्वर धाम चाकसू

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!! उत्तम आर्ज़व धर्म !!

उत्तम आर्जव धर्म पर बोले तपोभूमि प्रणेता….

उत्तम आर्ज़व धर्म की बात आती है तो सरल हो जाना ही आर्जव है…सरल होने का मतलब बुद्धू होना नही है फिर आपकी सरलता को लोग बुद्धू समझते है तो समझने दो भगवान आपको सरल समझ रहा है ये ही काफी है…ज्यादातर लोग आपमें गलत ही देखेंगे..पर सरल होने का मतलब गलत होना नही है सीधे सरल होने का मतलब कमजोर होना नही है जो सरल है वो धनवान है सम्पत्ति उसकी शरण में रहती है वो संपत्ति की शरण में नही रहता…पर आज लोग दिखाबा ज्यादा करते है …लोग बाहर से सरल होते है पर भीतर से बांस की तरह टेड़े मेढे होते है..जिसका मन सरल है उसके लिए धर्म सरल है …जिसका मन कठिन है … दूसरों को देखकर कर रहे हो तो आपके लिए धर्म कठिन है…संत हो जाना सरल है पर सरल होना कठिन है…जो सरल होता है वो उदास नही उदासीन होता है ..मैं इसलिए आनंद से जीता हूँ ताकि मेरा आनंद आपको जीवन जीने की प्रेरणा दे ..सरल होने की प्रेरणा दे आर्जव धर्म अपनाने की प्रेरणा दे …तो समझना आपने आर्जव धर्म को धारण कर लिया…

-मुनि प्रज्ञा सागर
आदीश्वर धाम चाकसू

!! उत्तम सत्य धर्म !!

सत्य, सृष्टि का आधार है: मुनिश्री प्रज्ञासागर जी 
उत्तम सत्य धर्म पर विशेष – मुनि प्रज्ञा सागरजी की कलम से

आज पर्यूषण पर्व के पाँचवें पायदान उत्तम सत्य धर्म का दिन है। सत्य शाश्वत है, अटल है, सृष्टि का आधार है। इसीलिए कहा जाता है सृष्टि शेषनाग पर नहीं, सत्य पर टिकी है। जिस दिन सृष्टि से सत्य निकल जायेगा, उसी दिन सृष्टि में प्रलय आ जायेगा। आज अगर हम जीवित हैं, सुरक्षित हैं, तो सत्य के कारण हैं। सत्य हमारा प्राण है, सत्य हमारे दिल की धड़कन है। सत्य के बिना यह काया चलती-फिरती लाश है। इसका होना, नहीं होना कोई मायने नहीं रखता है। अतः सत्य धर्म की महत्वता को समझकर इसकी कीमत आंकें।

आज लोगों की सोच है कि झूठ के बगैर तो जिया ही नहीं जा सकता है। यदि सत्य का सहारा ले लें, तो हमारा परिवार हमारा व्यापार सब चोपट हो जायेगा। लेकिन यह सत्य नहीं है, यह हमारी भ्रान्त धारणा है। सत्य बोलकर परिवार व व्यापार दोनों अच्छे से चलाया जा सकता है। हमारी दोहरी नीति हमें सत्य से दूर कर देती है। हम झूठ से हटकर सत्य के करीब आयें।

सत्य की अनुभूति सुखानुभूति है। जो एक बार सत्य को जी लेते हैं, वे सत्ता और सम्पत्ति के लिए सत्य का दामन नहीं छोड़ते, तो सत्ता और सम्पत्ति भी उनसे विमुख नहीं होती।

मैंने सुना है कि एक सेठ से ‘लक्ष्मी’ ने कहा- मैं जाना चाहती हूँ, आज्ञा दें। 
सेठ ने कहा तथास्तु ! 
‘यश-कीर्ति-पद प्रतिष्ठा’ ने कहा लक्ष्मी के बिना हम क्या करेंगे सेठ जी। हमें भी आज्ञा दें। 
सेठजी ने कहा- तथास्तु! 
अन्त में सत्य ने कहा- मुझे भी आज्ञा दें, मैं भी चलूँ। 
तब सेठ ने कहा- तुम्हारे सुरक्षा के लिए ही तो मैंने आज्ञा दी है। मैं सब कुछ छोड़ सकता हूँ, पर तुम्हे नहीं छोड़ सकता हूँ। 
सेठ की बात सुनकर सत्य वहीं पर रुक गया। 
सत्य को साथ न आता देख, लक्ष्मी आदि सभी जो सेठ को छोड़कर बाहर चले गये थे, वे फिर वापस आ गये। 
कहने का तात्पर्य ‘सत्य है तो सब कुछ है, सत्य नहीं तो कुछ नहीं।’

भारतीय मनीषा इसीलिए सदा से सत्य की पक्षधर रही हैं। हमारी राष्ट्रीय पहचान है ”सत्य मेव जयते”। अर्थात् सत्य की ही जीत है। 
इसलिए याद रखो, 
सत्य परेशां हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। 
अन्तिम विजय सत्य की ही होती है। 
जो सत्य का सहारा लेकर चलते हैं, वे पाण्डवों की तरह सदा विजयी होते हैं। 
धर्म भी श्रीकृष्ण की तरह सत्य का ही साथ देता ह

!! उत्तम शौच धर्म !!

उत्तम शौच धर्म पर बोले… तपोभूमि प्रणेता…

मन को निर्मल बनाता है शौच धर्म…तन की अशुचिता को तो बाहरी संसाधन साफ़ करते है पर मन की कलुषिता को साफ़ रखने के लिए शौच धर्म को अपनाना पड़ता है..
आदीश्वर धाम चाकसू में पर्युषण पर्व पर शौच धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिश्री प्रज्ञा सागर जी महाराज ने कहा आज सबसे ज्यादा लोग भोजन टीवी देखते हुए खाते है …अगर आप ऐसा करते है तो आज ही बंद कर देना क्यों की ऐसा करने से टीवी में आने वाले द्रश्य आपके मन के भावों को भी दूषित कर देते है और दूषित मन से किया गया भोजन भी लाभ नही देगा…जब तक हम लोभ की तृष्णा को कम नही करेंगे तब तक शौच धर्म जीवन में नही आ सकता ..लोभ सबका नाश कर देता है मान नाम प्रतिष्ठा सब ख़तम कर देता है..ये मन लोभ करने से नही चूकता…क्यों की मन छोड़ना नही चाहता …मन के हिसाब से मत चलना क्यों की मन लोभी मन लालची..मन कहता है कल नही मिला तो आज ही सब जोड़ के रख लेना चाहता है.. सच्चा सुख मन को संतोषी बनाने पर मिलता है..संतोषी सदा सुखी…मन की बाल्टी में संतोष की पेंदी लगना चाहिए ..जब पेंदी लग जाती है तो जितना जरुरत है उतना ही उसमे आयेगा…ठीक इसी तरह शरीर की स्थिति है जरूरत से ज्यादा इकठ्ठा करोगे तो बिमारी आ जाएगी…जिस तरह पेट भरने से पहले खाली करते हो उसी तरह पेटी भरने से पहले उसे भी खाली तो किया करो…पेट की तरह पेटी के सिध्दांत को बना लेंगे तो आपकी पेटी सुव्यवस्थित भी बनी रहेगी अतःशौच धर्म को अपने ह्रदय में धारण करे और मन को निर्मल बनाये…

!! उत्तम सत्य धर्म !!

उत्तम सत्य धर्म पर बोले…
तपोभूमि प्रणेता..

सत्य परेशान हो सकता है पर परास्त नहीं… यदि किसी की जान बचाना हो तो तुम्हारे असत्य वचन भी सत्य है…तोल मोल के बोल..जब भी अपने वचनों को बोले तोल मोल के बोलों…तोल कर बोले गए वचन आपकी पहचान होते है…हलके वचन बोलोगे तो लोग कहेंगे कितना ओछा बोलता है और वाणी में भारी पन होगा तो लोग कहेंगे कितना मीठा बोलता है इसकी बात में दम तो है…बात जब भी करो दमदार करो..लोग कहे क्या दमदार बात कही है …बडबड करने वाले को चुप करा दिया जाता है ..लोग सोचते है ये कब बंद होगा पर कम बोलने वाला काम का बोलने वाले के लिए लोग उसे सुनना चाहते है…की ये बोले..वचन सत्य तो हो ही साथ ही मन को भी प्रिय हो..कई लोगो की जबान में लगाम ही नहीं होती तो कई लोगो की जबान में आवाज़ ही नहीं होती चुप्पी ही होती है..नीतिकार कहते है सत्य बोलो पर आचार्य कहते है सत्य तो बोलो पर प्रिय सत्य बोलो सत्य कड़वा नही होना चाहिए…किसी की जान पर ना आये ऐसे शब्द कभी नहीं बोले…वाणी बाण का काम भी करती है और वीणा का काम भी करती है..बात सत्य हो और अप्रिय हो तो वो विवाद भी पैदा कर देते है…द्रोपदी के एक शब्द की अंधे का बेटा अँधा…बस इस शब्द ने महाभारत को खड़ा कर दिया…वाणी सत्य होकर यदि प्रिय नहीं है तो ऐसे सत्य वचन कभी मत बोलना…और किसी के लिए चिकनी चुपड़ी बात भी नही करना..ये भी सत्य वचन होकर भी असत्य है..सत्य के साथ जीने वाले लोग परेशान हो सकते है पर कभी परास्त नही हो सकते…जो झूठ की वैशाखियों के साथ चलते है वो मंजिल तक कभी नही पहुँचते है पर जो सत्य के कदमों के साथ चलते है वो एक दिन मंजिल तक पहुँच ही जाते है…
-मुनि प्रज्ञा सगार
आदीश्वर धाम चाकसू

!! उत्तम संयम धर्म !!

उत्तम संयम धर्म…पर बोले तपोभूमि प्रणेता…

संयम का अर्थ है परिवर्तन…जो आपका मन असंयम की ओर भाग रहा है उस मन को कहिये की अब संयम की तरफ भागे…संयमी व्यक्ति को संसार मार्ग कठिन लगता है और असंयमी को संयम का मार्ग कठिन लगता है …जो जग में रहकर भी जग से ऊपर रहे वो संयमी ..नाव पानी में होनी चहिये ना की पानी नाव में …आप संसार से दूर नही रह सकते पर मन को संसार से दूर कर सकते है..जिसे ढंग से जीना आ जाता है वो संयमी हो जाता है..कमल कीचड़ में खिलता है पर कीचड़ से ऊपर खिलता है…उसमे लिप्त नही रहता था..संयमी संसार में रह कर भी संसारी नही होता …संयम का धन हिम्मतवर लोगो के हाथ में ही आता है..संयम का अर्थ है दृष्टी का परिवर्तन…भोग की भाग रहे हो तो खुद को योग की ओर मोड़ लो ..संयम का अर्थ है u turn ले लेना… अगर गुरु हमें u turn दिखाए तो बिना सोचे समझे उस तरफ मुड़ जाना चाहिए.. मुड़ना तो होगा ही होगा आज नही कल …ये दिगंबर वेश धारण करना ही पड़ेगा..मनुष्य धर्म की साथर्कता संयम धारण करना ही है…संयम संसार सागर से तार देता है …मन से मजबूर होता है तो एक भी नियम धर्म का पालन नही कर पाता है लेकिन वही व्यक्ति जब मन से मजबूर नही मजबूत हो जाता है तो मेरी तरह मुनि प्रज्ञा सगार बन जाता है…जो ताकत आचार्य शांति सागर में थी वो ताकत तुम्हारे अन्दर भी है बस उस छुपी हुई ताकत को बाहर लाने वाला चाहिए…संभव सब कुछ है ऐसा कुछ भी नही जो impossible हो क्युकी impossible word ही कहता है
i m possible मैं संभव हूँ…तो संयम धारण करना मुश्किल लगता है पर असंभव नही है..
ॐ नम:
-मुनि प्रज्ञा सागर
आदीश्वर धाम चाकसू

!! उत्तम तप धर्म !!

उत्तम तप धर्म पर बोले…

तपोभूमि प्रणेता…जिसे आज चाह है वो गुमराह है… शांति की इच्छा रखने वालों को इच्छा की शांति कर देना चाहिए…क्यों की हमारी इच्छाए शांत हो जाए तो समझना आपको परम शांति की प्राप्ति हो जाएगी..विज्ञापन हमारे मन में इच्छाए पैदा करते है …लोग कहते है आवश्यकता अविष्कार की जननी है …मैं कहता हूँ गलत कहते है लोग …अविष्कार आवश्यकता की जननी है..पहले टीवी नही थी फिर उनका मनोरंजन होता था फिर भी उनका वक़्त कटता था..पहले संसाधन नही थे फिर भी लोग सलीके से रहते थे…पहले लोग ज्यादा सुखी थे क्यों की पहले साधन ज्यादा नही थे..साधन साधना को कम कर देते है..क्युकी जितने साधन बढेंगे साधना उतनी कम होगी…साधन ही लोगो को भोगी बना देता है..सुविधाए बढ़ी है तो दुविधाए भी बढ़ी है…संतुष्टि हो तो सूखी रोटी भी आनंद दे देती है..और संतुष्टि ना हो तो छप्पन भोग भी संतुष्ट नहींकर पाते है…मन को मनाना पड़ता है मन समझ जाता है …मन को कहो की दस दिन उपवास रखना है तो दस बार खाने वाले भी दस दिन भूखे रह लेते है..मन की बात मन मानना …मन के हिसाब खुद मत चलना बल्कि मन को अपने हिसाब से चलाना…अनंत इच्छाए इसी मन में पैदा होती है ..यदि तप धर्म को अपनाना है तो मन की इच्छाओ को शांत करना होगा…इच्छाओ का निरोध करना ही तप है.. तपस्या को अंगीकार करना हमारी ज़िन्दगी का लक्ष्य होना चाहिए..आज नही तो कल आपको इच्छा पर the end लिखना ही होगा…वरना ये इच्छाए हमारा अंत कर देगी…तप धर्म हमें यही सन्देश देता है..की अपनी इच्छा को कम नही ख़तम करने पर तो तप को अंगीकार किया जा सकता है…
ॐ नम:
-मुनि प्रज्ञा सागर 
आदीश्वर धाम चाकसू

!! उत्तम आकिंचन धर्म !!

उत्तम आकिंचन धर्म पर बोले…

तपोभूमि प्रणेता….
कोई नही किसी का साथी 
सबकी यात्रा एकाकी
ये स्वार्थ का संसार है एक मिनट में सपना होता है और एक मिनट अपना हो जाता है ..एक आत्मा ही अपनी है जो साथ देती है…शरीर को रोज स्नान कराते है पर आत्मा के स्नान के लिए धर्म रूपी कुंड में ही स्नान करती है…बाथरूम में शरीर को नहलाया जाता है…और मंदिर में आत्मा को नहलाया जाता है ..इस लिए रोज मंदिर जाना चाहिए…घर में तन की शुद्धि के लिए एक बाथरूम जरुरी है तो मन की शुद्धि के घर में एक छोटा सा मंदिर भी जरुरी है..जो मन को आत्मा को स्नान कराते है उनकी आत्मा काली नही उजली होती जाती है…आप रोज अभिषेक पूजा नही कर पाते है तो कोई बात नही कम से कम हफ्ते में एक बार दो बार तो किया ही जा सकता है…
ये आकिंचन धर्म यही सन्देश देता है की जो धर्म के लिए समय निकालता है उसकी आत्मा निर्मल होने लगती है..हम आत्मा का हम ख्याल ना करके हम शरीर के लिए परिग्रह कर रहे है..ये शरीर तो made in chaina है..जो कभी रंग बदल सकता है कभी भी खराब हो सकता है कोई ग्यारंटी नही है इसकी और आत्मा 100% साथ देगी..क्यों की किसी ने कहा है महंगा रोये एक बार और सस्ता रोये बार बार..ये आत्मा कीमती है पर हम कीमती चीज़ को छोड़ कर सस्ते शरीर का रखरखाव कर रहे है…ये मन नौकर है और आत्मा मालिक है..मन को जैसा कहोगे उसे करना पडेगा…पर ना शरीर काम करता है ना मन काम कर रहा है..जब आपको अकेले ही जाना है अकेले ही आये है तो इस आत्मा का ख्याल रखो..जितना वक़्त परिवार को व्यवसाय को देते हो उतना समय धर्म को भी दिया जाना चाहिए इस आत्मा को भी दिया जाना चाहिए…दुनियाँ को जीतने वाला सिकंदर भी जब दुनियाँ से विदा लिया तो उसके दोनों हाथ खाली थे ..फिर क्यों व्यर्थ में ये भागमभाग मचा रखी है तुमने..अरे कोई भी तुम्हे मृत्यु से नहीं बचा पायेगा..एक धर्म ही साथ जाएगा..इसलिए जो आसक्ति का भाव है वही परिग्रह है..और और मिलता जाए यही भाव परिग्रह है..परिग्रह का त्याग ही आकिंचन धर्म है …मेरा मेरा कहना बंद करदेना आकिंचन धर्म है..जब तक मेरेपन के भाव का त्याग नही करेंगे तब आकिंचन धर्म ज़िन्दगी में नही आ सकता है..ना मैं किसी का ना कोई मेरा ..अपने ख्याल के लिए दुनियाँ का ख्याल छोड़ना होगा..आकिंचन धर्म हमारे भीतर प्रगट हो यही भाव लेकर चलना है ..ॐ नम:
-मुनि प्रज्ञा सागर
आदीश्वर धाम चाकसू

!! उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म !!

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर बोले…

तपोभूमि प्रणेता…
ग्रहस्थ जीवन को जीते हुए भी ब्रहमचर्य को भी पाला जा सकता है …स्वदार संतोष व्रत का पालन करके आप विवाहित जीवन में भी ब्रहम्चर्य की साधना कर सकते है आप सिर्फ अपनी पत्नी में ही संतुष्ट रहेंगे…यही ब्रहम्चर्य का कथन है…परमपद को पाने का नाम है ब्र्हम्चर्य…स्वयं में उतर जाने का नाम है ब्रहम्चर्य …संत जीवन को अपनाने का प्रथम कदम है ब्रहम्चर्य…भरत चक्रवर्ती घर में रह कर भी बैरागी थे…आप गृहस्थ जीवन में भी इस धर्म का पालन कर सकते है महीने में 15दिन 20दिन 25 दिन धर्म का पालन कर रहना चाहिए. और इस तरह अंत में वानप्रस्थ को धारण करना चाहिए फिर पति पत्नी को भाई बहन के तुल्य रहना चाहिए…हमारे आचार्यो ने कहा है ब्रह्मचर्य धर्म में ही पिछले सारे धर्मो का सार समाया है …यही वो धर्म है जो हमें इस संसार सागर से पार करेगा…
-मुनि प्रज्ञा सागर
आदीश्वर धर्म चाकसू

उत्तम क्षमा पर्व

एक मात्र जैन धर्म है जो उत्तम क्षमा से पर्व प्रारंभ करता है और क्षमा वाणी से समापन करता है …मैं चाहता हूँ भारत सरकार क्षमा वाणी पर्व को राष्ट्रीय पर्व घोषित करे …पूरी दुनियाँ में एक जैन धर्म है क्षमा का उत्सव मनाता है …हम सबसे हाथ जोड़ने को तैयार है सबसे मिलने को तैयार…सबके सामने झुकने को तैयार है…हमतो छोटे से छोटे जीवों तक से क्षमा मांगते है …ये जैन धर्म है जो क्षमा भी उत्सव के साथ मांगते है…आप एक बार अपनी पत्नी से कहो उत्तम क्षमा ..पति से पत्नी कहे बच्चे माँ बाप से कहे ..की आपकी की कृपा से हमे वो सब मिलता है जो हम चाहते है…पापा आज तक आपने कभी हमारे लिए गलत नही सोचा आप के एहसान को हम नही भूल सकते ।।।आपकी कभी हमने इज्जत ना की हो आपका दिल दुखाया हो आपका कहा नही माना हो तो क्षमा करना ..अरे आप बाहर के लोगो को माफ़ करो ना करो …आपसे बाहर के लोग माफ़ी मांगे ना मांगे आप अपनों से माफ़ी मांगे जिनके साथ वर्षो से रह रहे हो उसने क्षमा याचना करना तो समझना की आपकी क्षमा वाणी सार्थक हुई..ऐसा कौन है जिससे गलतियाँ नही होती…पर गलतियों को नज़र अन्दाज़ कर माफ़ करना ही क्षमा वाणी है…आप तो क्षमा मांगते ही हो हम तो संघ में भी रहते थे तो आपस में क्षमा मांगते थे ..एक मात्र आचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी है जो अपने शिष्यों से झुक कर क्षमा मांगने में भी संकोच नही करते थे …गले लगाने में भी नही सोचते थे ..तो आज मैं प्रज्ञा सागर मन वचन काय से हाथ जोड़ कर आपकी कभी अवज्ञा की हो आपका कभी कहा ना माना हो तो मुझे क्षमा करे ..मेरे अग्रज मुनि तरुण सागर..मेरे से सभी अनुज मुनि प्रसन्न सागर मुनि अरुण सागर जी सौरभ सागर जी पुलक सागर जी प्रमुख सागर जी महाराज जितने भी मेरे अनुज गुरु भाई है सभी से मैं मन से वचन से क्षमा याचना करता हूँ…मैं प्रज्ञा सागर आदीश्वर धाम चाकसू की समस्त समाज जन से भी क्षमा माँगता हूँ…मेरे नाम के आगे तपोभूमि प्रणेता लगा हुआ है ..मेरा प्रथम सपना ..यहीं से मैं तपोभूमि परिवार से..और समवसरण तीर्थ भरूच के सभी समाज जन से भी क्षमा मांगता हूँ ..छोटा गिरनार मेरा साकार होने वाला सपना मैं छोटा गिरनार परिवार के सभी सदस्यो से भी क्षमा माँगता हूँ…मेरे संघस्थ सभी से क्षमा चाहता हूँ..मन का मैल धुलना चाहिए उसी दिन क्षमा वाणी होंजाएगी ..क्षमा धर्म कायरता नही वीरता है …झुकने का मतलब कायरता नही है…निर्बलता नही है…क्षमा करना ना दिल में रोष को धरना …क्षमा करना क्षमा करना..सबसे क्षमा सबको क्षमा ….
…..मुनि प्रज्ञा सागर

प्रज्ञासागर जी महाराज

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